देखो आज का इंसान कितना जुदा है
मुर्दे को ही मानता खुदा है
चंद मिट्टी के घरौदे
ईटों मे तब्दी हे गये
तभी तो
पत्थर के टुकड़े आज
देखो भगवान में बदल गये
कर्म की नसीहत मिट्टी हो गई
बरा सोहांरी आज लिट्टी हो गई
विडम्बना है भाई विडम्बना
जिसे कहते हैं लोग समाज का बदलना
देखें आज का इंसान कितना बदले हैं
सुधरा नही सुधारवादी नीति के पगले हैं
न मन बदला न मानसिकता
न रस बदला न रसिकता
तो कहां से आये एकजुटता का समरसता
क्योंकि जुबां से आज भी दोगले हैं
घर मे बनती नही गैरों से बनाते हैं
पकवान मिष्ठान बुलाकर खिलाते हैं
अपनों से ईर्ष्या कर
देखो गैरें को अपनाते हैं
है पुरानी परंपरा अपनी
शायद
यही वो दिखलाते हैं
तभी तो आज का इंसान कहलाते हैं
सुखन जोगी डोडकी वाले