Tuesday, 22 March 2016

छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़
गोठ करंव अत्ती बढ़
परदेसिया बिलई कस झपागे
छत्तीसगढ़िया मुसवा बन लुकागे
लगथे सोये रहिस
तभे तो नी जागिस

हाना कहावत अउ हांकी
तन म लगा देथे आगी
सब कथे इहां के सुभाव बागी
फेर परदेसिया काबर रहिगे बांकी

अदला बदली के रित नदागे
करम के करमईता ह रिसागे
तभे किसनहा के खेत बेचागे
बाहिर के बेपारी घर म आगे

कंपनी  ल बनवा के
सरकार के आँखी ह मुंदागे
इहां के मन नई जानव कहिके
बहिरहा मन भितरियागे

का का गोठ ल बताव
कतेक ल मे सुनाव
सरकारी नऊकरी घलो हजावथे
काबर के आऊट सोर्सिंग नीति ह आवथे
  
सहीद के परवार लुलवावथे
नकसली मन सादी रचवावथे 
अपन समरपन करके
सरकारी नऊकरी ल पावथे

छत्तीसगढ़ छत्तीसगढ़
गोठ करव मैं अत्ती बढ़

हद हो गई

हद हो गई -हद हो गई
चोरों की बड़ी कद हो गई
धन दौलत तो चुराते ही थे
अब कविता चुराने लगे हैं
कवियों के सामने ही 
वो अपना बताने लगे हैं

गंगा को गोदावरी बताने लगे हैं
सरस्वती से बहती सविता चुराने लगे हैं
कवि ग्रुपों मे वो आते हैं
खुद को वो कवि ही बताते हैं
किसी की अच्छी कविता जब ये पाते हैं
कॉपी पेस्ट कर फौरन कहीं और चिपकाते हैं

कट कॉपी पेस्ट का जमाना है 
चोर बड़ा सातिर सयाना है
हमको लग गई है भनक 
उसको नही ये बताना है
चोरी की जब करे वो पोस्ट
शब्दों की डण्डे मार भगाना है

                         जोगी जी....

चोर हैं सब चोर हैं

हमने कहा 
चोर हैं सब चोर हैं
कोई मुक तो कोई मुहजोर है
ऐसे ही लोगों का तो
यहां पर अब जोर है
गोदी मे मजदूर काम चोर
मस्टर रोल पे सरपंच नाम चोर
उपर से इन्जिनियर घुसखोर है
चोर हैं सब चोर हैं
कोई मुक तो कोई मुह जोर हैं
कहते गांव मे सीसी रोड आयेगा
कच्चा रोड पक्का हो जायेगा
विधायक भी तो कमीशन खोर है
चोर हैं सब चोर हैं
कोई मुक तो कोई मुहजोर हैं
कहीं से आवाज आई..
गांव मे बोर खुदवायेंगे
पीएचई से पानी टंकी बनवायेंगे
गली गली नल जरूर लगवायेंगे
सड़कों के किनारे नालियां बनायेंगे
घर घर शौचालय भी बनवायेंगे
घर की गंदगी नालियों मे बह जायेंगे
अब आप ही बताओ 
हम नही तो और कौन खायेंगे
हां चोर हैं सब चोर है 
कोई मुक तो हम मुह जोर हैं
देखा तो सरपंच का ही शोर है

                         
                     सुखन प्रसाद " जोगी जी"
                        डोड़की (बिल्हा )
                          मो. 8717918364

चल मेरे मन

चल मेरे मन 
तु कहीं चल 
खुली वादियों में 
जरा सा निकल
आसमाँ के तले
सागर नीले नीले
पर्वत झाड़ी
घोड़ा गाड़ी
सैर को निकल 
चल मेरे मन
तु कहीं चल
ठण्डी हवायें
बाहें ये फैलाकर
मुझे बुलाये
संदेशा लाये
याद किया है तुझे
मुझे बताये 
यै मेरे मन 
चल तु चल
सुरज ने भी 
किया ईसारा
निकल गया 
दिन ये सारा
क्यो बैठा रहा
बनके बेचारा
या तु भी हो गया 
मन का मारा 
चल मेरे मन 
तु कहीं चल

                  "जोगी जी"

Wednesday, 9 March 2016

सोये को जगाने आया हूं

जागो - जागो 
सोयों को जगाने आया हूं
क्रांति की मशाल लेकर 
सतनाम की जोत जलाने आया हूं

दुसरों की आदर कब तलक
अपनो की निरादर कब तलक
जगाता रहूंगा सोये हो तब तलक
पुकारता रहूंगा सुनोगे नही तब तलक

दुसरों की बात मानते हो 
अपनों की नहीं
दुसरों की इतिहास जानते हो 
अपनों की नहीं

चलो - चलो 
मैं चलाने आया हूं
सतनाम का झण्डा लेकर
आगे - आगे जाने आया हूं

तुम्हें आग चाहिये
मैं चिंगारी लाया हूं
तुम्हें ठण्डी बयार चाहिये
मैं तुफान लाया हूं

तुम्हें सुख चाहिये 
मैं मुश्कान लाया हूं 
मुठ्ठी में भर के 
जीने का अरमान लाया हूं

जागो - जागो 
विद्रोही तान लाया हूं
अपना हक लेने का 
सामान लाया हूं

प्रसुप्त ज्वालामुखी में 
उदगार लाया हू 
सोये इन मुरदों मे
भरने फिर वही जान लाया हूं

सतनामियों की शान लाया हूं 
अपनों का अभिमान लाया हूं 
गौर से देखो अब 
सतनाम धर्म सास्वत गान लाया हूं

जागो -जागो
सतनाम विधान लाया हूं
पुनः बाबा जी का 
मैं बखान लाया हूं

           सुखन जोगी 
                   डोड़की , बिल्हा
                            ०६/०३/२०१६

देखते देखत सब खेल नदागे

देखते देखत सब खेल नदागे

मन करथे फेर लइका हो जातेंव
सब लइकन संग खेले ल पातेंव 
गिल्ली डण्डा , पच गण्डा अउ  डण्डा कोलाल
फेर का पुछथस रेसटीप , नदी पहाड़ संग छु छुवाल
मन मोर तभो भरे निही नोनी संग खेल परथंव इत्तुल बित्तुल चाम चटिया गुरजी मरगे उठा खटिया
तिरिचउक , सांप सिढ़ही अउ गोटा बिनाल
परगे पारी अटकन चटकन दही चटाका 
नवा नवा सिखेन रे भइया मार पिट्ठूल कुदउला 
खेल खेल म पोसंम पा , घानी मुनि अउ लंगडी
थक हार के घर जातेन घर म दाई खेलावय लाखडी, तिवरा राहेर चना दार टारबे डोकरी राहटा ल गाड़ा आवथे 
थोकुन बड़ का होगेन रे भइया खेलेन भंवरा बांटी चिभ्भी तुकाल 
अतको म नइ त ढेलवा रहचुल , घर घुंदिया त कभु खेलन दस गोटिया , नव  गोटिया अउ बघवा घेराल 
गली गली घुम घुम के खेलेन फोटो , चक्का चलइ , त  पथरा फेकाल
सुरता आथे कका दाई के किसा डारा पतेरा त मखना तुमा 
फेर का कहंव ग कइसन जुग ह आवत हे
देखते देखत संगवारी जम्मो जिनिस ह नदावत हे 
अब के लइकन के बात निराला 
बिडियो गेम कम्पोटर यहा मोबाइल वाला
खेल नदागे गुडडी गुडडा 
आगे नवा जमाना म टेडी संग डोरेमान अउ छोटा भीम 
छोटकुन लइका के टु हु नदागे 
का य करन संगी छोटकन तन गंवागे 
देखते देखत सब खेल नदागे
मन के बात मन रहि जाथे 
काबर बड़ तन पागेन |

           सुखन जोगी 
                   डोड़की  ,बिल्हा

का सोंचेव का होवत हे

बिनसरहा के बेरा म कपाट के खटखटी के आरो आईस मे झकना घलेव , तभो ले सो घलेव फेर आरो आइस फेर आय हंव तोर मेर खोल न ग....
मे कहेंव कोन आस ग फेर आय हंव कहिथस...?
कहिस- में घांसी हरव ग...
मे झट ले समझ घलेंव मोर बबा फेर आय हे झटकुन कपाट ल खोल पहिली के भांति भाव भजन ल करेंव अउ पह्लीच कस मे ह भुइंया म बइठगेंव बबा ल बिसतरा म बइठा के फेर कहेंव का बात ये बबा कइ से  सुरता करे मोर गरीब के ....
बबा- भइगे इहिच्च तो बात ऐ..... 
मेय समझ नइ पायेंव त पुछेव - का इहिच्च बात ऐ बबा... ? 
बबा - मे कब तुहंर सुरता नइ करव , मे कब तुहंर ले रिसा घले हंव अउ मे कब तुहंर ले कुछु मांगे हंव ....? त आज तहुं कहत हस कइसे सुरता करे कइके ....
मे कहेंव भइगे बबा नराज झन हो ..
बबा  खिझिया के कहिस - मे कब होथंव नराज तुहंर ले जी , मोर जम्मो लइका मन के तुहंर इहिच्च गोठ हे...
बबा मे नइ समझेंव थोकिन फोरिया के बता न का बात हे तेला में हर कहेंव .....
बबा- तोला जाननेच हे त सुन ...
           मे का सोचे रहेंव अउ का होवत हे...... 
           अतका ल कहिके बबा ह चुप होगे ....
मे कहेंव - बबा कइसे चुप होगेस बने फरिया न ग...
बबा- मे का कहे रहेंव अउ तुमन का करत हव .... अउ तें कहिथस बने फरिया  , ले चल तही बता मे का कहे रहेंव ....? 
मे सकपका गेंव बबा मोला कब का कहे रहिस फेर कहेंव बबा कब तें ह मोला का कहे रहे मोला तो कुछुच समझ नी आत हे ....
बबा - ले... अब तोला कुछु पतेच नइ हे त का जानबे मे का कहे रहेंव  ... अरे निमुझ मे अपन कहिनी अउ सीख के गोठ करत हंव ...
मे कहेव ..वा... अइसे बात ऐ बबा मोला तो सब याद हे , बबा के कहे ले पहिली च ले मे ओरियाय लगेव...

बबा आप मन के उपदेस --
☄☄☄☄☄☄☄☄☄
१ " सतनाम " ह सार हे ! जउन ह सबो  जीव के घट म समाय हवे येखर सेति "सतनाम " ल मानव !

२ "सत" ह मनखे के  गहना आय  ! त सत ल मन, बचन, करम , बेवहार अउ आदत  म उतार के , सतगियानी , सतकरमी अउ सतगुनी बनव !

३ " मनखे -मनखे एके बरोबर  " माने धरती म सबो  मनखे चाहे नर होय के नारी सब  बरोबर हें !

४ पखरा पुजा माने मुरतीपुजा , अंधबिश्वास, रूढ़िवाद, बाहिर दिखावा आडम्बर, छुआछूत, ऊंचनिच, जातिपाति भेदभाव, बली परथा, मांस भक्षन,  नसा तियाग , व्यभिचार, चोरी, जुआ अउ अनेंग अनेंग  अनइतिक करम ल छोड़व !

५ काम, कोरोध, मोह, लोभ, अहम, घिरना जइसे षडबिकार मन  ल तियाग के सत , अहिंसा, दया, करूना, सहानभूति जइसे मानवीय गुन  मन ल अंतस धरके सत के मारग म  चलव !

६ नारी  अउ  पुरूष बरोबर हें  ! नारी के मान राखव  ! पर नारी ल माता जानव !

७ सबो  जीव उपर दया करव  ! गाय भंईस ल  नांगर मत जोतव अउ ठढहे मझनिया नांगर मत जोतव !

                     अतका ल सुन बबा ह कहिस - अब तिही बता तें मोर कोन कोन कहिनी ल मानथस .....? 
     
अब मे का बतांव मोर मुढ़ी निचु कोति गढ़ गे कउनो जवाब नइ दे सकेंव..

बबा -  ओ दिन मे हर अपन लइकन ल जउन सीख ल ऊंखर कोथा म गठिया के धराय रहेंव  , जउन भाखा म बइठाय रहेंव ओ ह आज छुट गेहे  अब ते धियान लगा के सुन मे बताथंव 
मे कभु नी कहेव के तुमन मोर पुजा करव , मोला नरियर सुपारी खवावव , मोर करा घोलन -घोलन ,भुइंया नापत आवव, मोर मुरती बनावव.....

फेर काबर अइसन करत हव  अरे मे तो कहत हंव "सतनाम"  ल  "जानव" अउ  "सतपुरूष"  ल  "मानव" 
सत ल जानहु त  "सतनाम" ल जानहु अउ जब सतनाम ल जान जहु त "सतपुरूष" ल अपने आप जान जहव !
का सोचथव तुमन का मे हर तुहंर ले रिसा गेहंव फेर का मे ह तुमन ल चिनहत नइ हंव त तुमन मोला चिनहाय बर या मनाय पथाय बर भुइंया नापत - घोंडत आथव अउ अतेक अतेक खरचा कर कर नरियर परसाद चढ़हाथव ........
ये सब ल देख के मोला खुसी नइ दुख लागथे ,  येखर ले तो कउनो दुखिया ल या कउनो जीव परानी ल खवा पिया के सेवा करतेव जेखर ले ओ जीव के पेट भरतीस त ओ ह भुखन नई मरतिस ........
मोर गियान ह मोर जिनगी भर के तियाग अउ तपसिया ह अबिरथा होगे मोर लइका मन मोला भुलागेव , मोर कहिनी ल नी मानत हव उलटा रद्दा रेंगत हव , मे जउन जिनिस ल मना करेंव उही ल करत हव , अरे मे तो ये जाति पाति के पचड़ा ल टोरे खातिर करम करेंव फेर नई टुट पाइस , मोर करम के सीख ल गठिया के नी राख सकेव , राखतेव त मे ह तुहंर माधियम ले अपन बचन ल पुरा करतेंव जइसे सतपुरूष साहेब ह करिस  फेर तुमन तो ,
मोर- तोर म भुलागेव , मोर करांती के आगी ल बुझो डारेव ....
मे तुहंर दुख ल कहां दुर कर सकहुं तुहंर दुख ल तो ओ "सतपुरूष" अउ  "सतनाम" ह दुर करथे मे तो बस माधियम आव फेर तुमन काबर नी समझव मोर कहिनी ल काबर नी मानव आज सगरी जमाना ह मोला ताना मारत हे .........
                                   अतका कहत ले बबा के आँखी ले आँसु ह टपक घलिस...... 
ये हाल ल देख के मे बबा ले छमा मांगत कहेंव बबा हमला छमा कर दे .. फेर मे परन करत हंव के अपन जियत ले तोर कहिनी अउ उपदेस , जम्मो सीख के परचार करत रइहंव अउ सोये समाज ल जगात रइहंव , तोर बताये रसता म चलत रइहंव , किसा कहानी कस तोर गोठ ल कहत रइहंव  ......
            सिरतोन कहे बबा आज हम तोर तियाग तपसिया के मरम ल नई जान सकेन अउ दुनिया भर के भुलावा म भुलाके तोर सिख ल बिसरा देन  बबा तोर आय ले आज मोर आँखी खुलगे ......

अतका कहत ले फेर दरवाजा खटखटाय लागिस अउ मोर आँखी ह खुल घलीस ...... मे जाग गेंव .....

आज मे अपन संत समाज ल ये कहना चाहत हंव भाई जागव , उठव अउ हमर समाज म जतका कुरित हे ओला दुर करव हमर बबा के गोहार ल सुनव ....... मे तो जागे के परयास करत हंव त   "हे ! संत समाज" मोर हाथ जोर के घोलन के बिनती हे तुहु मन जागव......... 
☄☄☄☄☄☄☄☄☄☄
* लगन ले करे एक परयास इतहास बदले बर काफी रइथे *

            सुखन जोगी 
                    डोड़की , बिल्हा 
                              8717918364
                                        ५/३/२०१६

Tuesday, 1 March 2016

झगरा ओखी के खोखी होथे

लतेल अउ सतेल दुनो भाई बबा मेर जाय बर घर ले निकलथें थोकन दुरिहा म जाके सतेल ह कइथे -भाई लतेल ते राजू ल बला अउ मेहा सोनू ल बलाके लानथव ओ समारू बबा के घर तिर भेट करबो फेर बबा करा किसा सुने चलबो !
लतेल - ठिक हे भइया !
समारू के घर मेर सबो के भेट होथे 
राजू- ते बने करे भाई मोला बलाके लाये फेर मे तो भुलइ गे रेहेव, ले चलव बबा मेर चलीं!
सबो झिन एके साथ कहिन- चलव चलव चलिन अब !
बबा मेर पहुच घलीन बबा देखते ही कहे लगीस- मे जानथंव तुमन कइसे आय हव , तुहर काली के किसा ह बाचे हे ....
सोनू -हव बबा उही ल सुने बर आय हवन!
बबा- तुमन अपन निस्ठा ल रखेव त मोरो फरज बनथे कि मे अपन भाखा के मान रखव , मे तुमन ल किसा जरूर सुनाहूं!
फेर मे कोन मेर रेहेव....... बबा ह जानके पुछीस!
लतेल- बबा किसा ह तो पुरगे रहिस फेर हमन झगरा ह ओखी के खोखी होथे ल पुछे रहेन , तिही ल बता कइसे होथे ?
बबा - हां....सिरतोन कहे....
" मन के बैइर ह बैईरी ल खाथे " एला पहिली जानव तहां ले ओखर मरम ल खुदे जान जाहु!
राजू - ओ कइसे बबा ?
बबा- ले मे बताथंव...
        धियान लगाके सुनिहव..... जब कखरो   बर हम बैर रखथन त ओ बैर के बसीभूत होके हम ओ मनखे के अहित करे के उदिम करत रहिथन ,इही परयास म हम अपन बिकास नइ कर सकन जेकर से हम अपन , अपन परवार के, घर बार के  जतन ल करे छोड़के ये गुनत रहिथन कब मऊका मिलय त ओकर फजीहत करव!
अपन मन ल सफा रखे ले छोड़ मइल भरत रहिथन जेखर से हमर खुद के जिनगी घलो ह परभाबित होथे ! येखर सऊंहत परछो मे बतावत हंव अंते कहां जाबो अपने गांवे म देख ले ओ.. रमेसर ल जोऊन मंगलू बर बैईर करके मंगलू ल खरी खोटी सुना डारिस मंद मऊहा ल पिके फेर गांव के सबो झिन रमेसरे ल लताड़ दिन त का रहिगे रमेसर के गांव के आघु म ओखरे तो फजिहत होइस न...
सिहतोन केहे बबा मे रहेव ओ दिना.. सोनू ह कहिस !
बबा - देखव भइ ये गोठ ल कखरो मेर झिन कइहव, येखर ले बदनामी ह बढथे! 
मे तुमन ल समझाय बर बताय हंव ! अतका जान लव ये ल बाहिर म कईहू त रमेसर के  नइ तुमन मोर बदनामी करहू !
लतेल - नइ कहन बबा .. फेर अईसे कइसे होही  ?
बबा- देखव भइ ... अइसे कइसे होही के घलो जवाब हे , आज मे तुमन ल कहे हंव काली तुमन बाहिर म कइहू गोठ बात बढ़ही , तिल के ह ताड़ अउ राइ के ह पहाड़ बनही तहां ले नियाव होही , नियाव म कोन कहिस पुछे जाही जेमा तुमन मोर नाव बताहव जिहां गांव भर मोला बद्दी देहे आहीं घांसी ते लइका मन ल किसा के बहाना म उटपटांग सिखावत हस त..   मोर तो बदनामी होगे न जी.... 
सबो एके संग कहिन -  हव.. हव.. नई कहन बबा...!
अब देखव तुमन खुदे गुनव रमेसर ल का मिलिस..... ? कोनो बता सकत हव....?
मे बताव बबा - सतेल ह कहिस !
बबा - ह ते बता..!
सतेल- गांव भर म बदनामी होइस जेखर ले ओखर मान ह लोगन के नजर म कमतिया गे..!,
बबा - ठिक कहे तेहां, काबर के बैइर ह बैइरी के संग म हमु ल खा देथे जेखर ले हम गलत संगती म पड़ जाथन तिहां ले गलत करम करे लगथन फेर का हे दुसर के बिगाड़ करत करत हम अपने बिगाड़ कर डरथन , फेर हमर आँखी नी खुले मुंदाय के मुंदाय रहिथे जइसे मंगलू ह रमेसर ल जुआ चित्ती अउ दारू ल छोड़े बर कहिस त रमेसर ह ओखरे बर भड़क गे....
अब तुमन का समझेव तेला बतावव......!
मे बताव बबा-- सोनु कहिस 
बबा - ले बता...!
सोनु - बबा हम जान डरेन "" बैइर ह बैइरी ल खाथे "" ओसनहे हे जईसे "" झगरा ओखी के खोखी होथे "" जइसे हम दुसर बर बैर रखथन त हमरो जिनगी परभाबित होथे ओइसनेहे झगरा म घलो हमर खुदे के जिनगी ह परभाबित होही, हमर खुद के बिगाड़ होही ! काली महु ह रमेस मेर झगरा होय रहेव जेखर ले मोर दाई अउ ओकर दाई खुब झगरा होय  रहिन , अब मे समझेव मोर दाई काबर कहत रहिस "एक झन लइका गली भर ढिंढोरा पिटाथे" , ते कोखरो मेर झगरा मत करे कर! 
मे आज के बाद कखरो मेर झगरा नी करंव! 
हव... हव ..हमु मन समझगेन अब हमु मन झगरा नि होवन.. सबो झन कहिन! 
ले जावव त मोर किसा ह पुरगे..... बबा ह कहिस !

सुबिचार :-
                 * हर महान मनखे के जिनगी ह पहिली सधारन होथे *

                     कहिनीकार-  सुखन जोगी
                           डोड़की ( बिल्हा )

सुन्ता के जरी धिरज आय

बबा घांसी असनाद खोर के मलागिर चंदन लगाके बढ़िया सादा- सादा धोती बंगाली पहिर के बेटी सहोदरा के ससुरार जाय बर पदजात्रा करत निकलीस दस कोस के जात्रा के बाद एक ठन गांव के बस्ती म पहुंचीस बीच बस्ती म बड़ झन आदमी जुरियाय रहिन जेमेर कुछ आदमी झगरा होत रहिन फेर कोनो सांति करे के परयास नई करे अउ टुकुर टुकुर देखत बस रहिन थोकिन रूक के बबा ह सब हाल ल देखिस देखे के बाद बबा ह तिर म गइस बबा के बेस-भूसा ल देख के सब देखइया मन परनाम करिन  बबा सब ल आसिस देके झगरा होवइया मन ल पुछिस - कइसे भइ तुमन काबर झगरा होवत हव  ! 
झगरा होवइया मन बबा ल देखके सांत होगे फेर एक झन ह कहिस - बबा ते हमर झगरा म मत पर ते परदेसिया आस ते कुछु ल नइ जानस !
बबा मुस्कुरा के कहिस - परदेसिया तो तहुं हरस जी .....
ओ आदमी फेर कहिस - बबा ते कइसे कहिथस परदेसिया मे ह , मोर तो ए ह घर आय!
बबा- हांसे लगिस फेर कहिस, देख जइसे मे तुंहर बर परदेसिया आव , थोर समे म मे चल दुहूं ओइसने ये दुनिया म तहूं परदेसिया आस  ! कुछ समे म तहूं चल देबे फेर ये धरती ह तो कहुच नइ जाय ! 
दुसर मनखे ह कहिस - देख बबा हमर झगरा म तोर काय काम फेर तैं काय कहना चाहत हस ...?
बबा- मोर काय काम.....? फेर मे पुछना चाहत हंव ये झगरा म काय मिलही अउ ये झगरा काय जिनिस के ए....?
एक माइलोगिन तिर म बइठे मुडी धरे रोवत रहिस तेहर कहिस - बबा ये दुनो झिन मोर बेटा ए , झगरा जगा के बटवारा बर होत रहिन , मे बटवारा कर देंव त ए मन ये मंदिर बर अउ मोला रखे बर झगरा होवत हें ! 
एक ह कथे मंदिर म मे तोला आवन नइ दंव फेर दाई ल तें ह रखबे त दुसर ह कथे मंदिर ह मोर ए मे बनाय हंव येमा तोला घुसरन नई दंव अउ रहि बात दाई के त तोला रखेच ल परही मे नइ रखव.....
बबा.. मोर तो मरना होगे जिनगी भर कमा कमा के नान्हे ल बड़े करेंव , जिनगी भर के तपसिया मोर बिफल परगे सियनहा के रहत ले सुख म रहेंव जाने अब का होही ...... इही रोना ल मेहा रोवत हंव  !
बबा - सुनव भाई हो .. मोर गोठ ल सुनहु त मे कुछ कहना चाहत हंव जेखर ले तुहंर समसिया के निदान तुरते हो जही....
दुनो झिन एके संग कहिन - का बात हे बता..?
बबा- " सुनता के जरी धिरज आय " अगर धिरज धरके सुनहू त सुनता ह माढ़ जाही !
मोर एक ठन गोठ के जवाब ल बतावव....?
दुनो भाई- काजित ल....?
बबा- तुहंर सियनहा ह बिदीस त का लेके गिस हे....? का रूपिया -पइसा , धन -दउलत , जगा-भूम ल लेके गिस या फिर का करिस बतावव..
दुनो भाई के मुह ले जवाब नइ निकलीस..
बबा- अउ रही बात मंदिर के त तें कइथस आन नइ दंव त ओ कइथे जान नइ दंव, फेर ओ भगवान ह कोनो ल मना नी करे के तें मोर पुजा मत कर , हम तो अपन आस्था दिखाय बर पुजा करथन ! 
सउहत दाई ददा जेहर भगवान के बरोबर होथे ओखर हम सुबे साम चरन पखारे नई सकत हन अउ ए मंदिर म रखे पखरा के देंवता के पुजा करे बर झगरा होवत हन कहां ले सही हे बतावव...
ये महतारी ह तुहर ननपन म कतेक सुघ्घर तुहर जतन करिस , तुहर नान - नान खुसी बर मेहनत कर तपसिया कर के पुरा करिस फेर ओला आज का मिलिस का इही सोंचे रहिस ओ महतारी ह काली मोर बेटा मन बड़े होके मोला रखे बर झगरा होंही ...
महतारी तो ओ रूखवा के समान होथे जेन ह सब ल छांय देथे चिरई चिरगुन, पसु पच्छी , जीव जंतु सबो ल फेर कोनो ले नी कहय ते जा मे तोला छांव नइ दंव अउ फर लगे म फर घलो देथे हमर खाय बर फेर कुछु नी मांगे  ओसनहे महतारी होथे अपन कोनो लइका म भेद भाव नी करे एके समान मया देथे! 
येखरे सेति कहे गेहे .. " जग भर ल दे छांय उही रूखवा बर आय "  जइसे बर के रूखवा ह अपन अकार ल बडे करके बड़ दुरिहा ले छाथे जेमा अवइया जवइया राहगीर मन ल छाव देके काम करथे जेमा ओखर कोनो सुवारथ नी रहय ओसनहे महतारी के दुनिया ओखर लइके हर होथे अपन लइका बर ओ ह अपन दिन रात ल पहा देथे , ओकर जरुवत पुरा करे बर अपन जिनगी खपा देथे !
मे पुछथंव का दे हव तुमन अपन महतारी ल , का सुख पाय हे , तुही मन बतावव...?

दुनो भाई के आँखी ले आँसु बोहाय लागीस , बबा ले माफी मांगे लगिन- हमला छमा कर दे बबा हम सुवारथ म अंधरा होगे रहेन , हम दाई ददा के तियाग तपसिया ल नइ समझ सकेन!
महतारी के ममता ल नई जानेन अउ ओखर बांटा करे ल भिड़गेन ....
बबा-  तुमन मोर से माफी झन मांगव माफी मांगना हे त अपन महतारी से ओ माता से मांगव जेखर तुमन गुनेगार हव , ओ छमा कर दीस त सगरी दुनिया छमा कर दीस ..
अतका ल सुन के दुनो भाई अपन दाई के पांव तरी गिरगें अउ रो रो के छमा मांगे  लगिन ... फेर मां तो सच म महान होथे ओ ह छिन म छमा कर दीस..!
दुनो भाई जम्मो झगरा ल भुला के गला मिलीन अउ महतारी ल उठा के दुनो झिन बांह ल धरे घर भितरी चल दीन.....
बबा अपन गंतब्य राह म आगु बढ़गे.......

सुबिचार-
                * राह चलत म जिनगी के सिख हे पता नइ चले कब कहां मिल जही  *

                कहिनीकार- सुखन जोगी
                       डोड़की    ( बिल्हा )

किस्सा के मरम

गांव म बर के रूख तरी जम्मो सियनहा मन जुरियाय रहिन जेमा दुकलहा , मंगलू ,  इतवारी , ढलगन अउ जेठु घलाव रहिस सबो झिन गोठियात रहिन गोठ के बिसे रहिस किसा , काबर के किसा ह हमर पुरखा पाहरो ले चले आत हे ! सब अपन अपन बिचार ल रखिन ! 
दुकलहा- देखव ग किसा अइसे जिनिस ये जेखर ले हम सिच्छा- दिच्छा पाथन अउ उही सिच्छा ले तहां हम अपन अवइया पिढही ल बरो देथन जेकर ले उमन  अपन जिनगी  ल जियत ,  सुधारे के परयास करथें जइसे हमन करे हन!
ढलगन- देखव भाई मोर तो अतकेच कहना हे किसा ह हमर  मन बहलाय के  जिनिस आय जइसे चुटकुला जनउला हर हसी ठट्ठा के जिनिस ए !
मंगलु- बात अईसे नोहे भइ  किसा हमर पुरखा राज ले चले आत हे ये ह हमर पुरखा मनके जिये जिनगी ए जेन ल हमन किसा कहत हन !
ईतवारी-  मोरो गोठ ल सुन लव ग मोर बिचार कथे ये किसा ह रिसी मूनि मन के लिखे ये जेखर ले ये मन सिच्छा देहे के काम करथें फेर संसकिरित म कइथें जेखर ले हमन नी समझ पावन!
इही बेरा म घांसी घलो आ घलीस आवत देखके तिर म बलाइन !
घांसी- का गोठ चलत हे ग त महु ल हूत करथवव..
जेठू हर सबो के बिरतांत ल आरी पारी घांसी ल सुनाइस! 
घांसी - जेठु कका ! ते ह ये मेर हमर सबो ले सियनहा आस , तोरो का बिचार हे बता डर ग...
जेठु- देखव ग उम्मर ह तन ल सियनहा करथे मन ल नई, मे तो अढहा हंव मोर बिचार ह नइ जमत हे, अब तिहीं कुछु बता घांसी..
घांसी- मे तुहंर सब ले छोटे आंव फेर आपन सियान मन ल मे का बताहूं तभोले एक ठन गोठ करे चाहत हंव .....
कहि न ग... दुकलहा ह कहिस! 
घांसी- किसा ह हमर देस राज के बिसेसता आय ! इही हमर सिच्छा , संसकिरति के अधार ए, ये ह पुरखा ले चले आत हे , तुमन जानथव आज हमला पढ़हे लिखे के हक नइ ए ! आज हमर लईकन के भभिस गढ़हे के अधार नइ ए, आज हमर देस म हमर राज नइ रइगे हे जेखर ले हम लचार हो गे हवन! 
इही सब ल देख के परख के हमर पुरखा मन अपन जिनगी ल सुघर जिये बर , अपन लइकन म सिच्छा के संचार बर, सिच्छा - दिच्छा गियान बर ये किसा के मरम ल बताइन अउ किसा के रिति ल चलाइन!
हमर पुरखा ह हमर भभिस बर बड़ दुख झेलिन नाना परकार ले कस्ट सहिन , किसिम किसिम के बिचार करिन गुनिन हरिन तब जाके ये किसा कहिनी जनऊला चुटकुला ह आइस फेर धीरे धीरे लइकन ल सुनाय के सिखाय के परकिरिया ल अपनइन जेखर ले उनमन अपन लइका के मति के बिकास करिन भल आदमी कइसन होथंय , कपटी मनखे मन कइसन होथें ये खर मरम ल इही किसा अउ जनऊला के माधियम ले बताइन ! 
येखरे सेति ये हा हमर देस के बिसेसता ए !
फेर घांसी हमर देस के सिच्छा नीति के गियान ल तो नी पायेन -- मंगलु ह कहिस
घांसी - कइसे कइथस मंगलु, चुटकुला जनऊला फेर हाना के गोठबात म हमन गनित के जोड़ , घटा, अद्धा , पऊना, गिनती, बिसकुट्टा ल सिखबे करथन जी, अउ किस्सा कहिनी ले जिये के सलिका , सोंच समझ गियान घलाव ल पाथन ! हां फेर ये अलगे बात ये के लिखे पढ़हे ल नइ सिख पायेन,  मोर ये बिसबांस हे के पुरखा के तियाग , तपसिया , परयास ह बेअरथ नइ होय ग!
आज हमला इही मेर परन करना चाही के हम ये सबो जिनिस ले अपन लईका मन ल सिखाबो जिये के सलिका बताबो येकरे सहारा म अपन लइका मन ल अपन हक बर लड़े ल सिखाबो , ऊंखर मति के बिकास करबो ! किस्सा अउ कहिनी के सहारा म सिच्छा के इसतर ल बढहाबो का होही गर हमर लइका आज इसकुल नइ जा सकत हे येखरे माधियम ले हमन अपन लइका मन ल पढहाबो जेखर ले भभिस म हमर लइकन मन इसकूल जा सकय, पढ़ सकय!
जेठू- सही केहे घांसी तेहर ,किसा के मरम ल तहीं ह सिरतोन जाने हस ! 
आज हमन सबो ये परन करत हन के हमर देस म ये किसा , कह्नी जनऊला, हाना अउ चुटकुला ल जुग जुग ले जियावत रहिबो , अपन खुन पसिना के पानी पियावत रहिबो , जेखर ले हमर भभिस बनही अइसन पुरखा के बाना ल भाखा ल लमावत रहिबो , किसा ल बगरावत रहिबो, नवा लइकन ल सिखावत रहिबो, परन हे- परन हे !
सबो झन एक संग कहे लगिन -
परन हे - परन हे- परन हे हां परन हे......

सुबिचार:- 
               * बिचार करान्ति के अधार होथे चलगे त दुधारी तलवार होथे *

           कहिनी कार --  सुखन जोगी
                         डोड़की ( बिल्हा )