Wednesday, 9 March 2016

का सोंचेव का होवत हे

बिनसरहा के बेरा म कपाट के खटखटी के आरो आईस मे झकना घलेव , तभो ले सो घलेव फेर आरो आइस फेर आय हंव तोर मेर खोल न ग....
मे कहेंव कोन आस ग फेर आय हंव कहिथस...?
कहिस- में घांसी हरव ग...
मे झट ले समझ घलेंव मोर बबा फेर आय हे झटकुन कपाट ल खोल पहिली के भांति भाव भजन ल करेंव अउ पह्लीच कस मे ह भुइंया म बइठगेंव बबा ल बिसतरा म बइठा के फेर कहेंव का बात ये बबा कइ से  सुरता करे मोर गरीब के ....
बबा- भइगे इहिच्च तो बात ऐ..... 
मेय समझ नइ पायेंव त पुछेव - का इहिच्च बात ऐ बबा... ? 
बबा - मे कब तुहंर सुरता नइ करव , मे कब तुहंर ले रिसा घले हंव अउ मे कब तुहंर ले कुछु मांगे हंव ....? त आज तहुं कहत हस कइसे सुरता करे कइके ....
मे कहेंव भइगे बबा नराज झन हो ..
बबा  खिझिया के कहिस - मे कब होथंव नराज तुहंर ले जी , मोर जम्मो लइका मन के तुहंर इहिच्च गोठ हे...
बबा मे नइ समझेंव थोकिन फोरिया के बता न का बात हे तेला में हर कहेंव .....
बबा- तोला जाननेच हे त सुन ...
           मे का सोचे रहेंव अउ का होवत हे...... 
           अतका ल कहिके बबा ह चुप होगे ....
मे कहेंव - बबा कइसे चुप होगेस बने फरिया न ग...
बबा- मे का कहे रहेंव अउ तुमन का करत हव .... अउ तें कहिथस बने फरिया  , ले चल तही बता मे का कहे रहेंव ....? 
मे सकपका गेंव बबा मोला कब का कहे रहिस फेर कहेंव बबा कब तें ह मोला का कहे रहे मोला तो कुछुच समझ नी आत हे ....
बबा - ले... अब तोला कुछु पतेच नइ हे त का जानबे मे का कहे रहेंव  ... अरे निमुझ मे अपन कहिनी अउ सीख के गोठ करत हंव ...
मे कहेव ..वा... अइसे बात ऐ बबा मोला तो सब याद हे , बबा के कहे ले पहिली च ले मे ओरियाय लगेव...

बबा आप मन के उपदेस --
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१ " सतनाम " ह सार हे ! जउन ह सबो  जीव के घट म समाय हवे येखर सेति "सतनाम " ल मानव !

२ "सत" ह मनखे के  गहना आय  ! त सत ल मन, बचन, करम , बेवहार अउ आदत  म उतार के , सतगियानी , सतकरमी अउ सतगुनी बनव !

३ " मनखे -मनखे एके बरोबर  " माने धरती म सबो  मनखे चाहे नर होय के नारी सब  बरोबर हें !

४ पखरा पुजा माने मुरतीपुजा , अंधबिश्वास, रूढ़िवाद, बाहिर दिखावा आडम्बर, छुआछूत, ऊंचनिच, जातिपाति भेदभाव, बली परथा, मांस भक्षन,  नसा तियाग , व्यभिचार, चोरी, जुआ अउ अनेंग अनेंग  अनइतिक करम ल छोड़व !

५ काम, कोरोध, मोह, लोभ, अहम, घिरना जइसे षडबिकार मन  ल तियाग के सत , अहिंसा, दया, करूना, सहानभूति जइसे मानवीय गुन  मन ल अंतस धरके सत के मारग म  चलव !

६ नारी  अउ  पुरूष बरोबर हें  ! नारी के मान राखव  ! पर नारी ल माता जानव !

७ सबो  जीव उपर दया करव  ! गाय भंईस ल  नांगर मत जोतव अउ ठढहे मझनिया नांगर मत जोतव !

                     अतका ल सुन बबा ह कहिस - अब तिही बता तें मोर कोन कोन कहिनी ल मानथस .....? 
     
अब मे का बतांव मोर मुढ़ी निचु कोति गढ़ गे कउनो जवाब नइ दे सकेंव..

बबा -  ओ दिन मे हर अपन लइकन ल जउन सीख ल ऊंखर कोथा म गठिया के धराय रहेंव  , जउन भाखा म बइठाय रहेंव ओ ह आज छुट गेहे  अब ते धियान लगा के सुन मे बताथंव 
मे कभु नी कहेव के तुमन मोर पुजा करव , मोला नरियर सुपारी खवावव , मोर करा घोलन -घोलन ,भुइंया नापत आवव, मोर मुरती बनावव.....

फेर काबर अइसन करत हव  अरे मे तो कहत हंव "सतनाम"  ल  "जानव" अउ  "सतपुरूष"  ल  "मानव" 
सत ल जानहु त  "सतनाम" ल जानहु अउ जब सतनाम ल जान जहु त "सतपुरूष" ल अपने आप जान जहव !
का सोचथव तुमन का मे हर तुहंर ले रिसा गेहंव फेर का मे ह तुमन ल चिनहत नइ हंव त तुमन मोला चिनहाय बर या मनाय पथाय बर भुइंया नापत - घोंडत आथव अउ अतेक अतेक खरचा कर कर नरियर परसाद चढ़हाथव ........
ये सब ल देख के मोला खुसी नइ दुख लागथे ,  येखर ले तो कउनो दुखिया ल या कउनो जीव परानी ल खवा पिया के सेवा करतेव जेखर ले ओ जीव के पेट भरतीस त ओ ह भुखन नई मरतिस ........
मोर गियान ह मोर जिनगी भर के तियाग अउ तपसिया ह अबिरथा होगे मोर लइका मन मोला भुलागेव , मोर कहिनी ल नी मानत हव उलटा रद्दा रेंगत हव , मे जउन जिनिस ल मना करेंव उही ल करत हव , अरे मे तो ये जाति पाति के पचड़ा ल टोरे खातिर करम करेंव फेर नई टुट पाइस , मोर करम के सीख ल गठिया के नी राख सकेव , राखतेव त मे ह तुहंर माधियम ले अपन बचन ल पुरा करतेंव जइसे सतपुरूष साहेब ह करिस  फेर तुमन तो ,
मोर- तोर म भुलागेव , मोर करांती के आगी ल बुझो डारेव ....
मे तुहंर दुख ल कहां दुर कर सकहुं तुहंर दुख ल तो ओ "सतपुरूष" अउ  "सतनाम" ह दुर करथे मे तो बस माधियम आव फेर तुमन काबर नी समझव मोर कहिनी ल काबर नी मानव आज सगरी जमाना ह मोला ताना मारत हे .........
                                   अतका कहत ले बबा के आँखी ले आँसु ह टपक घलिस...... 
ये हाल ल देख के मे बबा ले छमा मांगत कहेंव बबा हमला छमा कर दे .. फेर मे परन करत हंव के अपन जियत ले तोर कहिनी अउ उपदेस , जम्मो सीख के परचार करत रइहंव अउ सोये समाज ल जगात रइहंव , तोर बताये रसता म चलत रइहंव , किसा कहानी कस तोर गोठ ल कहत रइहंव  ......
            सिरतोन कहे बबा आज हम तोर तियाग तपसिया के मरम ल नई जान सकेन अउ दुनिया भर के भुलावा म भुलाके तोर सिख ल बिसरा देन  बबा तोर आय ले आज मोर आँखी खुलगे ......

अतका कहत ले फेर दरवाजा खटखटाय लागिस अउ मोर आँखी ह खुल घलीस ...... मे जाग गेंव .....

आज मे अपन संत समाज ल ये कहना चाहत हंव भाई जागव , उठव अउ हमर समाज म जतका कुरित हे ओला दुर करव हमर बबा के गोहार ल सुनव ....... मे तो जागे के परयास करत हंव त   "हे ! संत समाज" मोर हाथ जोर के घोलन के बिनती हे तुहु मन जागव......... 
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* लगन ले करे एक परयास इतहास बदले बर काफी रइथे *

            सुखन जोगी 
                    डोड़की , बिल्हा 
                              8717918364
                                        ५/३/२०१६

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