Sunday, 31 January 2016

का गोठ ल सुनाव मे का गोठ ल बताव

ऐब सब म हे अपन  ल सुनाव
अपन ल नही त काखर ल बताव
मन हे भल त ददरिया गावव
हे भोगाय त झगरा मतावव
का गोठ ल सुनाव मे का गोठ ल बताव..१

सब कथे गुरतुर हे येकर बानी
फेर कथे दिखत हे येखरो चिनहारी
आघु म झन करहू कऊनो गोठ बात
पेट म जामे हाबे येखरो दांत
का गोठ ल सुनाव मे का गोठ ल बताव...२

छिन म मताथे येहा झगरा
हवय जी बड़ येहा लबरा
भोरहा म झन रईहू दिखत के सिधवा
का कहिथे , ताकत रहिथे बनके गिधवा
का गोठ ल सुनाव मे का गोठ ल बताव...३

कतको कथे अइसन नही 
ये गोठ हर नो हे सही 
हम रेंगे हन संग म
रेहे हन ओखर तिर म
का गोठ ल सुनाव मे का गोठ ल बताव...४

रेहे बर लबरा तेहा दुसर ल कहिथस
जबरन के जबरन ओखी मड़थस
कहा के गोठ ल कहा ले गे
अब चुप कर भईगे
का गोठ ल सुनाव मे का गोठ ल बताव...५

                      सुखन जोगी 
                 ग्राम-  डोड़की (बिल्हा)

परभुता अउ माटी के कूता

संझा के बेरा घांसी बबा ह अंगना म मचोलिया म बईठे रहय बड़ सुघ्घर भजन गावत रहिस-
पुरखा के बाना नई टोरव मैहा न
धरे सत के रद्दा ल नई छोड़व मैहा न.....
का रखे हे परभुता म
सब जाही संगी माटी के कूता म....
पुरखा के....
ठउके समे म सोनु , राजु , लतेल अउ सतेल दुनो भाई आईन  बबा के तिर म आके पाव परथन बबा कहिके ,कहे लगिन -
बबा बड़ दिन होगे एको ठन किस्सा नि सुनाय हस येदे हम किसा सुने आय हवन |
बबा - अच्छा.. त तुमन किस्सा सुनहु ले चलव भई बईठव त..
मे तुमन ल किसा सुनात हंव
बबा अभी ते का गावत रेहे ग राजु ह पुछीस !
बबा -  मेहा बेटा !...भजन गावत रहेव |
परभुता अउ माटी के कुता का ए बबा सतेल ह पुछ लीस |
बबा - हास के कहिस अभी तुमन लईका हव , फेर मे तुमन ल बताहू | परभुता अउ माटी के कूता का ए | 
सुनव... 
परभुता- ए ह आदमी ल आदमी कर लड़वा देथे अउ आदमी से आदमी ल जोर घलो देथे, झगरा ओखी के खोखी होथे | 
लतेल - बबा ऐ ह आदमी ल आदमी करा लड़वा  देथे फेर जोर घलाव देथे कईथस कईसे ...?
बबा - बतावत हंव...
आदमी अपन परभुता लाय बर , अपन जोर चलाथे, हर समे मोर चलय कहिथे अउ चलाय के परयास करथे जेकर ले कईयो आदमी ओखर बईरी हो जथे फेर कतको ओखर संग घलाव धरथें जईसे कऊनो परिवार म सियनहा हर कमा कमा के रूपिया पईसा जोर जोर के घर बार बनाथे फेर जब ओखर लईका के सियानी आथे त ओ लईका ह दारू मंद जुआ चित्ती म भुला के खेत खार ल बेच भांज डरथे त गांव के मन कहिथे सियनहा हर अपन परभुता म कतका सुघ्घर जगा भूम ल बनाय रहिस फेर ए लईका हर मेट डारिस|
येकर सऊहत उदाहरन हे  हमर देस म एक झन पठान राजा रहिस जेकर नाव बादसाह अकबर रहिस ओ ह दुनिया भर लड़ाई लड़ के जीतीस अउ पुरा भारत देस म एक छत राज करिस | 
फेर ओकरे बंस म औरंगजेब होईस जेन हर अपन बाप अउ अपन भाई ल मार के अपन परभुता लाईस | अपने बंस के नास कर दिस |
अब ते जान डरे परभुता बनाथे घलो फेर बिगाड़थे घलो ....
बबा परभुता ल तो जान डरेन फेर ए माटी के कूता का होथे- सोनु हर कहिस|
बबा - अब मे तुमन ल माटी के कूता ल बतावत हंव | 
माटी के कूता ओईसने होथे जईसे गऊटिया मन किसान करा अपन खेत ल बोय बर कुता दे देथे , अतका कन मोला ते कमा के देबे उपरहा हर तोर ए तइसे 
माटी के कूता हर आय | 
एक दुसर के मुह ल देख के लतेल हर कहिस - बबा कुछु समझ म नई आईस | 
बबा - मे समझात हंव ...
जईसे किसान हर गऊटिया ल कमा के दिस तईसे हमन ल अपन जिनगी म सुघ्घर करम के बुता ल करत पहाना चाही , चोरी चकारी,  मारा मारी , झुठ लबारी अउ हिंसा ल तियाग के सही करम ल कर के जिनगी बिताना चाही | धन दऊलत जिनगी के जरूवत आय ओ ह संग म नि जाय , आदमी कतको कमा ले रूपिया पईसा जोर लय फेर संग म नई ले जा सकय ले जा सकत हे त बस मान सनमान अउ नाव ल जेन ल ओ ह भल करम कर के कमाय रथे | 
मरे के बाद सब ल एक दिन ए माटी म मिल जाना हे | ईही ह माटी के कूता ए..
समझ म आईस ग.... सबो झन ल | 
सबो झन एक साथ कहिन - हव बबा ! 
ए जिनगी ह हमला कूता म मिले हे जियत ले सही करम करबो अउ येकर फल मरे के बेरा मान सनमान के रूप म मिलही फेर बाकी हर ओ गऊटिया के ए जेन हर हमला ए जिनगी ल देहे हे |
राजू- बबा ए ओखी के खोखी का हरे ..
बबा - काली बताहु रात ह बड़ होगे हे जावव सुतव |

         कहिनीकार-   सुखन जोगी
          ग्राम -    डोड़की ( बिल्हा )
                        बिलासपुर ,छ.ग.

Friday, 29 January 2016

कहिनी:- बबा कहे सियानी के गोठ


           

एक दिन बबा ह तरिया म असनादे ल गईस !  घठऊंदा म समारू ह असनादत रहिस !  असनाद के ओहा  सुरूज देवता ल पानी दे लागिस ! बबा के नजर ह परगे  बबा देख डारि स फेर कहिथे - ऐ का करथस समारू , तरिया के पानी ल तरिया म रिकोत हस ! समारू ह कहिथे - घांसी ते बऊरा गे हस मे तरिया के पानी तरिया म निही सुरूज देवता ल अरपन करत हंवव  !  बबा कहे - अच्छा..... फेर  गुने  लागिस...... , गुन के कहिथे - कस ग समारू त ... सुरूज देवता हर तोर पानी ल झोकिस हे ग अउ झोंकिस हे त कऊनो आसिस नी दिसे ग, काय कहिस हे ग...!
समारू कहे - घांसी निच्चट जोजवा हस ग !
बबा कहे - कईसे ! 
समारू- घांसी ऐ कलजुग हे ग कलजुग म देवता मन नी दिखे फेर झोंक लेथे ओ केहे गेहे न " हुम नई हुम के बास "...!
बबा कहे - बस...  इहीच्च तो मे कहत हंवव ! 
समारू  - कईसे !
बबा - आज तोर ले तो नी झोकिस त तिही सोंच पाछु समे म काखर ले झोके होही ! समारू करम ह बड़े हे ते अपन करम ल कर , तोर करम हर सही रइही त तोला भल आदमी समझ मान गउन दिही अउ गलत करम करबे त बुरा भला कईही फेर तोर मान गउन नी करे , इही मान गउन ह देवता के पुजा ए...!
येदे ते मोर धरम ल भरस्ट कर देहेस ! मोला पाप चढहा देस कहिके फेर डुबकी लगाके गुस्सावत समारू ह रेंग दीस !
बबा - मोर गोठ हर कोनो ले नीक नई लगे बने तो केहे हंव  अरे भई कोनो हर मोला कुछु दीही त मे हर झोंकहूं अउ नी झोकहूं त ओ जिनिस ह गिर जही समारू के पानी ह तरिया म गिरिस त सुरूज देवता हर कहां ले झोकिस  ! अपने अपन म बड़बड़ावत असनादिस गमछा ल झटकार के तन म लपेट के घर आ घलीस ! नहा खोर के तईयार बबा हर चऊरा म बईठे गीत ल गावत हे - 
धरती दाई तोर छाती हे जबर , 
सबो ल समुझे तेहां ऐके बरोबर ...! 
कोन चिरई चिरगुन कोन जंगल झारी
कोन मानुस तन लेहे अवतारी
नई पुछेस तेहां नर अस के नारी
येदे काया के होही उबार संगी रे...
ये चोला के होही उबार संगी रे
मिले हे पारख गियान बने गठिया के धर...!
भोलवा किसान ह खिझियावत आवत रहिस
बबा कहिस - का होगे भोलवा , काखर ऊपर खिझियावत हस !
भोलवा - कुछु नी होय हे घांसी मे हा ओ टुरा ऊपर खिझियावत हंव मोर नाती ऊपर !
बबा कहिस - काय कर दीस तोर नाती हर ! 
भोलवा - ओ टुरा ह.... मोला नईच गमहेरय भई , मोरेच आघु म मोरे म के बीड़ी ल निकार के चोंगियावत रिहिस केहेंव त कहिथे पिबो नही त काय करबो अउ बिजरा के भाग घलीस !
बबा कहे - देख भाई भोलवा हम खेत म धान बोथन त धान जामथे , अब ते हर घर म बमरी के बिरवा लगाबे त बमरीच हर जामही न फेर बमरी के कांटा ह त गढबे कर ही न .... !
भोलवा कथे - घांसी  मे हर अपन दुख ल गावथंव अऊ ते हर रूख राई ल बतावत हस ! 
बबा कहे - बात ओसनहा  नोहे भोलवा ! 
भोलवा - त का हे ! 
बबा कहे - भोलवा तोर घर म बीड़ी लाईस कोन , तेहां त भुगतना ल तो भुगते ल परबेच करही न ! 
वहा दे तहुं हर मोरेच ऐब निकारत हस ! अब मोर आदत परगे त मे का करव जी कहिके रेंग दीस !
बबा फेर अपने म गोठियाय लागिस - हम अपन गलती ल नि सुधार सकेन त दुसर के ल कईसे सुधारबो ! येखर बर हमला दुनिया ह ताना तो मारबे करही ! 
फेर गुनगुनाय लागिस - 
लऊड़ी लेहव ठोंक ठठा के 
अउ ढोर लेहव बने बजा के....
ओसनेहे पानी पिह  रे संगी छान के 
त गुरू बनाहव जान के ....
अतकेच म जसोदा ह घर भितरी ले सियनहा ल बखानत - दिन रात घर भितरी खोखोर खोखोर करत रहिथे , ये मेर ओ मेर थुकत रहिथे हम येकर लिदरी गोबरी करबोन कहत गोबर फेके घुरवा म जावत रहीस ! बबा ल चऊरा म बईठे देख कहिस - राम राम ग बबा ..
बबा - खुस रहा नोनी ..., चुल्हा मेर के ददा ह सुहावत नईहे  अउ फुल ददा ल भितरावत हस ! 
ये काय उटपटांग कहिथस ग बबा जसोदा ह कहिस !
बबा - बने तो केहे हंव ओ ... !   अतके सुघ्घर मिठ्ठ भाखा ते हर अपन घर के सियनहा मेर गोठियाते त तोला आसिष देतिस अउ तेहां बखानत हस , तुहंर खुसी बर का नई करीस सियनहा ह तुंहर फेर तुमन ओखर मान नई रख सकेव ! 
अतका म जसोदा ह बबा बर तंऊआ के चल दीस ! 
बबा हर फेर गुनगुनाय लागिस  -
तोर पिरा ओतकेच जतका मोर पिरा हे
हस गोठिया ले बने जऊन ये जिनगी के किरा हे....
का राखे हे ये तन मा
मया दुलार राख सबो बर मन मा.... !

टीप :- ""कोनो आदमी के सीख हर ओखर समे के आदमीयन बर बुरा लगथे फेर जब उही आदमी हर नई रहय त ओखर सीख ह दुसर आदमी के जिनगी जिये के रद्दा बन जथे ""!

                     सुखन जोगी 
      डोड़की तह -बिल्हा बिलासपुर ( छ.ग.)
                 मो. 8717918364

Sunday, 24 January 2016

नन्ही चिड़िया

अंडे की सीलवट को तोड़कर
निकली अभी अभी एक नन्ही चिड़िया
उसके पास एक वैसी ही चिड़िया 
बिलकुल उसी के जैसी
निसंदेह उसी की मां थी
वो झट से उड़ी लाई चंद दाने खिलाने को
खिलाकर अपनी सारी ममता लुटा दी उस पर
शरीर ने जब थोड़ा आकार लिया
वो उड़ने को तत्पर हो चली
प्रयास करने लगी 
क्रिया देख मां ने दी प्रतिक्रिया
सामने लगी उछलने पैरों के बल
यह देख छोटी चिड़िया चल पड़ी आसान करने उछल पड़ी
लिडंबना थी बड़ी एक पैर  मे हुई खड़ी
यह देख बच्ची विकलांग निकली
मां के मन से चिख निकली
साहस कर  सिखाने  लगी उड़ान 
कहने लगी बना  लो अपनी खुद की पहचान
हौसला भर वो एक पैर मे कुदने लगी
चंद रोज मे मां ने उसे उस भीड़ मे ला खड़ा किया 
जिसे कहते हैं लोग दुनिया
यह देख छोटी चिड़िया हतास हुई 
झट मां को ये आभास हुई
मां ने कहा  मत कर अफसोंस उसका जो तेरा साथ नही
कमजोर वो अंग है  जो तेरा हाथ नही
क्यों करती है परवाह गैरों का 
फिर अफसोंस क्यों इन पैरों का
पैर नही क्या हुआ पर तो हैं
आज आस्मा तेरी उड़ ले तु
मन मे हिम्मत की सांस भरी
पल मे उड़ गई मेरी नन्ही परी.....

          सुखन प्रसाद "जोगी जी"
       मो. 8717918364

खदर के बगल मे महल

क्या किसी ने देखा है खदर के बगल मे महल
जलता हुआ खड़ा है अविचल अटल
यही प्रमाण है उसका 
के वो खदर के बगल मे बना है
मालिक के पैसों के दम पे तना है
वहीं खदर खून पसिने के बहने से बना है
कहते हैं
जो दिखता है वो बिकता है
तभी तो
न बोलने वालों के चने रह जाते हैं 
और बोलने से अकरी बिक जाते हैं
ये सत्य है
वो मालिक क्या जाने मोल महल का
जो मूरत है मजदूरों के पहल का
तभी तो 
महल बिक जाते हैं लाखों में
और खदर रूक जाते हैं वजूद की बातों में
जो दिखता है वो होता नहीं
और जो होता है वो दिखता नहीं
तुम्हें पता नहीं 
चलो मैं बताता हू
महल बनाते वक्त मालिक पैसे देता है 
और वो उसका हिसाब लेता है
पर
पर खदर बनाते वक्त वो व्यक्ति
अपना तन - मन देता है 
धन कम लगे कोई बात नहीं
स्वर्ग है उसका खदर जज्बात वहीं
व्यक्ति चकाचौंध मे खो जाये वो महल 
चैन की निंद जहां सो जाये वो खदर
ये सोंचो जरा 
बदलाव की नई पहल है
देखो खदर के बगल में खड़ा महल है..

          सुखन प्रसाद "जोगी जी"
       मो.  8717918364

Saturday, 23 January 2016

राही मैं राही


मै राही हूं उन्मूक्त
चलना मेरा पेसा
राह चलते थक जाऊं
पर कभी न डारूं डेरा
चलना है बस चलना
क्या शाम क्या सवेरा
राही बहुत हैं पर
हमराही नही
अपराधी बहुंत हैं
पर गवाही नही
कौन बताये अब
क्या गलत क्या सही
राही मै राही
पथ का हूं राही
किसी ने पूछा
ठहरोगे नही
हमने कहा चलोगे नही
चलना है चलना
बस मंजील के
लायक ढलना
कभी सोंचा नही
मोड़ ऐसा आयेगा
जीवन मे बदलाव लायेगा
पर अफसोंस नही
ये परिवर्तन कहलायेगा

जोगी जी

" मैं "

हर जगह लगी होड़ है ,
मै  की जहां दौड़ है|
मुझे सब कुछ पाना है,
मै की ये कारनामा है||

मै समझौता नही करता, 
मै किसी से नही डरता|
मै पे मै ही करता भरोषा, 
मै नही रोपण करता दोषा||

मै कहता लाजवाब हूं,
मै आफताब हूं|
जो करता हू,
एकदम सही करता हूं ||

मै मे छुपा मान,
मै ही करता अपमान|
मै ही लगने देता दोष,
मै ही करता अफसोंस||

मै ही गिराता ,
मै ही उठाता|
मै ही बिगाड़ूं,
मै ही बनाऊं||

मै बात बनाऊं ,
तो मै बिगाडूं भी|
मै अपना बनाऊं,
तो मै लडाऊं भी||

मै ही जोग कराता,
मै ही भोग कराता|
मै ही निर्माता,
मै ही भग्यविधाता||

मै की दौड़ मे कोई नही आगे,
दौड़ मे केवल मै ही भागे|
मै मन मे साजा,
मै ही मन का राजा||

मै राज्य व्यापित,
मै देश निष्कासित|
मै व्यथित -मै पतित,
मै लज्जित- मै गर्वित||

मै ही नाश मै ही विनाश,
मै ही करता सत्यानाश|
मै ही रास मै ही सांस,
मै ही आस मै ही अंधविस्वांस||

मै मानुष मै भगवान,
मै गरीब मै धनवान|
मै प्रकाश मै आभास,
मै अगोचर अनंत आकाश||

                "जोगी जी"

Wednesday, 20 January 2016

दर्शन

कितना अजिब है
हम दर्शन करने मंदिरों मे जाते हैं
मंदिरों मे अंदर विराजित पत्थर की मूर्ति
आभूषणों से लदी और वस्त्रों से सजी
जहा  हम शांति का अनुभव करते हैं
पर हमें कुछ दर्शन नही होता
वहीं मंदिर के बाहर
कुछ अपंग निर्धन निर्वस्त्र गरीब
शायद यही दर्शन है
जो हम वहां नही करना चाहते
उनके अंगों की अपंगता व बरबस जर्जरता
ये सब नहीं देखना चाहते
फिर क्या है ये दर्शन ..?
उसी ईश्वर की बनाई मिट्टी की काया
उसी प्रभु की करूण दया की माया
हम नही देख सकते
पर हम स्वयं के द्वारा  बनाये गये ईश्वर
हमारे ही द्वारा सजाये गये प्रभु को
निहार कर अध्यात्म का दर्शन करते हैं
और वहीं जीवन का दर्शन हमें नही होता
जहां जीवन कर्मों व कर्मों के फल पर टीका है
जीवन का हर पल मानो उसी फल पर बीका है
कर्म ही जीवन की अंतिम युक्ति
अंतिम युक्ति से ही मानव की मुक्ति..

             जोगी.

Monday, 18 January 2016

इच्छा हे मोरो पढ़हे के

इच्छा हे मोरो पढ़हे के ,
सिच्छा के रद्दा म चले के !
ददा गय सरग सिधार ,
दाई हे घर म बिमार !
ठाने हंव करम करे बर ,
नानचुन दु कंवरा के पेट भरे बर....१

इच्छा हे मोरो पढ़हे के ,
पिठ म बस्ता धरे के !
तेखरे सेति पान बेंचथंव ,
ननपन के अपन जान बेंचथंव !
कुसियार कस तन ल पेरथंव ,
जांगर के रसा हेरथंव...............२

इच्छा हे मोरो पढहे के ,
जुता, मोजा, कुरता पहिरे के ,
संगी संग जाये के ,
पढ़ के इस्कूल ले आये के ,
फेर , गरीबी ह मार डारथे !
त मन ह काम डहर जाथे .............३

इच्छा हे मोरो पढहे के ,
पढ़के गुरूजी बने के !
बरबाद झन होय कोनो लईकन ,
अईसन जीवन गढ़हे के !
सपना हे मोरो ,
जीवन म आगु बढ़हे के................४

इच्छा हे मोरो पढहे के ,
इस्कूल के होमबर्क करे के !
गिनती ल लिखे के ,
पहाड़ा ल सिखे के !
फेर कुरता बर तरसथंव ,
एक रूपिया बर भटकथंव............५

इच्छा हे मोरो पढ़हे के ,
सिढ़ही नवा चढ़हे के !
नोनी ल पीठ म धरे हंव ,
घर के बोझा ल बोहे हंव !
फेर कर सकहूं के नही सोंचे हंव ,
करबेच्च करहूं जांघ ल ठोके हंव.....६

इच्छा हे मोरो पढहे के ,
सिच्छा के रद्दा चले के ...........

       " सुखन जोगी "
ग्राम - डोड़की (बिल्हा) जिला - बिलासपुर मो. 8717918364

सतनामी कहे पुकार के

सतनामी कहे पुकार के!
हिम्मत है तो आजा ललकार के!!
वतन की जजबा हम में भी!
उखाड़ देंगे दूश्मनों के खम्भे भी!!
मत भूल औरंगजेब को ललकारा था!
दो दो बार फटकारा था!!
घाती हम में ही था तभी तो खायी मात!
वरना हम से लड़े गैरों की क्या औकात!!
अक्सर ये देखने मे आते हैं!
दुश्मन देख हमको घबराते हैं!!
हौसला हम मे है मस्त!
बैरी हमको देख हो जाते हैं पस्त!!
देखा नही क्या तुने विरता की मूरत !
साक्षात राजा बाबा की सूरत !!

             जोगी , 
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

Saturday, 16 January 2016

मानुष विचार( आत्मनिरिक्षण)

मै बुराइयों का भंडार हुँ 
ढूँढ सको तो मुझमे अच्छाई ढूँढो
            अच्छाई मिले तो मै स्वर्ग हुँ 
           बुराई मिले तो नर्क का द्वार
माँ की ममता हू तो कहीं पिता की फटकार
बडो का सम्मान हू तो कहीं मै तिरस्कार
             कहीं चिन्तन की पराकस्ठा हुँ
             तो कहीं मै प्रथम हूँ विचार |
नव यौवन की लज्जा हूँ
कहीं युवा का अभिमान 
            आज वृद्ध का स्वाभिमान हूँ
             तो कल था मै बालक नादान |
मानुष मे है मेरा वास
अमानुष मे नही करता प्रवास
           मुखरित होता हुँ कभी सुविचार
           तो कभी कटाक्षीय परिहास |
दिल को जीत लेता हूँ बनके उपकार 
तो कहीं अभिवादन  मे प्रतिहार
            समझो मुझे मुलत: जीवन सार
            हूँ मैं मानुष विचार ||"

                            " रचनाकार "
                            सुखन जोगी 
                            ग्राम-डोडकी       
                     मो. नं. 8717918364    

छत्तीसगढ़िया जब्बर परबुधिया

छत्तीसगढ़िया  जब्बर परबुधिया

सब कहे छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
मधु कहे  छत्तीसगढ़िया जब्बर परबुधिया
काट काट हम खाथन कुसियारी ल
सेहराथन जी अपन हुंसियारी ल
नई दिखय हमला दुनिया दारी
करथन जी हम काम बेगारी .....१

सब कहे छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
मधु कहे छत्तीसगढ़िया जब्बर परबुधिया
खोल के देखव आंखी के दुआर
कोन करत हे तुंहर राज म बेयपार
भेल , गुपचुप ,चाट के लगे ठेला
जघा नई पावव मढ़ई , बजार अउ मेला.....२

सब कहे छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
मधु कहे छत्तीसगढ़िया जब्बर परबुधिया
जुरमिल के रहईया भुलायेव ऊंखर बात म
झगरा होथव आज ऊंच- नीच जात पात म
मिलगेव रे भईया लबरा के सांठ- गांठ म
अईसने करके सेंध मारिन तुंहर राज- पाठ म........३

सब कहे छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
मधु कहे छत्तीसगढ़िया जब्बर परबुधिया
जघा-जघा कम्पनी लगत हे
जेमा बाहरी आदमी भरत हे
बेलन, गाड़ी, दऊरी ह नंदागे
एक फोन म हारवेस्टर ह आगे.......४

राज भाखा बनगे छत्तीसगढ़िया
तभो पढ़े लिखे नई पायेव रे परबुधिया
खुर्सी म बईठ अपन भाखा पढ़हाये बर
जोर लगावत हे आज ऊड़िया
तभो कईथंव छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया
ले महूं कहथंव छत्तीसगढ़िया सिरतोन परबुधिया...........५

                 यह कविता मधुराज को समर्पित.......    

                       "  सुखन जोगी  "

Friday, 15 January 2016

बेसरम

अब तो हर घर म लगत हे 
लोगन के बारी म सजत हे 
पुछे म कहिथे, 
घर के रखवारी करत हे
भईगे ईही बात ऐ, 
घर घर म बेसरम उगत हे |

बेसरम हंसथे खेलथे फुलथे फरथे 
जमाना के परवाह नी करे 
जम के लड़थे आघु बड़थे 
जब घर के मन नी कहे सके 
इही ह कहिथे
घर के लाज बचाथे |

न रेहे के चिंता न खाऐ पिऐ के
जे मेर जाथे मिलथे ओला अनुकुल जिए के
इही ल कहिथे जिनगी के सामंजस
जेला ओ ह भली परकार ले जानथे
कोई जिये ले जाने चाहे झन जाने
कोई माने झन माने ओहा मानथे |

आज के जमाना ल कहिबे त 
इही मन के राज हे
काबर के
ईखरे मन के सिर म ताज हे
अपने असन ल चट पहिचानथे
अउ झट संग म घुमावत हे
इही मन तो
गांव गांव के बेटा अउ देश के नेता कहावत हें |

कहिथें इंखर फूल ह बास नी करे
ऐहा दुसर के कुल के नाश करथे
रही जाथे त बस 
ऐखर सत्ता
तभे तो हर जघा राज करत हें |

बिधाता घलो ह 
ऐखरे मन के लाज रखथे
तभे तो
ईखर मन के सिर म ताज रखथे
ऐही सेती कहे गयहे
नाव के नही बाबू
ऐहा काम के बेसरम ऐ |

चऊक चौराहा परिया अउ खार म
बड़े बड़े बेसरम लगे आज बेयपार म
कहां खोजे ल जाबे
इही मन मिलथे
सबो कोती सनसार म |

ऐहा डेरावय नही कोनो ले
घलो रिसावय नही कोनो ले
मिठ मिठ गोठियाथे मधरस डारे सरी
कतको लतिया चटक जाथे गुर पागे सरी
तें नेवता दे फेर झन दे
हबर जाथे बेड़ा म जाने सरी |

होथे इंखर जघा जघा पुछाड़ी ह
केहे म इंखर निकल जाथे बड़े बड़े गाड़ी ह
अबूझ मन समझे ऐला सबुझ
करथे बड़ खातिरदारी ल
अउ गोड़ तरी गिर करत हे पयलागी ल |

             सुखन जोगी 
       ग्राम - डोड़की, बिल्हा
       मो.नं. 8717918364

 सत के घूंट पियादे
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सतग्यान के पानी म
तत के जरी घोर
सत के घूंट पियादे |
          अर्थ अनर्थ होगे
          अनर्थ होगे अर्थ
          ऐला सुन सब सोगे
          सोये ल जगादे
           सत के घूंट पियादे |                             फंसे हे सब ,निंदा चारी म
धरम लिखत हें , आज उधारी म
काय जाबो कहिथे , दुनियादारी म |
      अरे अबूझ अब तो जाग
       जिनगी भर सोये रहिबे
       थोकिन अपनो बर भाग
      अपन लेखा ल ईतिहास म लिखादे
       सत के घूंटपियादे||
सब के हवय लिखाये
तोरले तोला कउन देखाये
काबर के ! तोर ल उही मन छुपाये |
             जागबे त भागबे
             खोजबे त पाबे
              कुछु नई करबे
              देखत रहि जाबे
             मऊका म एक दिन पछताबे |
सनघर्ष हे तोर जीवन
कुरिति ले लडे बर पुरखा करे परन
उही राह म चले बर कर ले अब जतन|
      आज करबे के काल करबे
      अरे अब नई करबे त कब करबे
      सोंचले समझे अउ थोकन परखले
      तत के सत ल लइकन के कोथा म गठिया दे
       सत के घूंट पियादे |
जिनगी भर करहीं इही बुता ल
करहीं तोरो सुरता ल
नमन करके पुरखा के कर्ताधरता ल |
        सबे पारखी बने फिरत हे
         लिखत हे अउने पऊने
         काखर नाव लेवव मय
        दिखही जऊने तऊने धियान लगादे |
         सत के घूंट पियादे ||

               सुखन जोगी
               मो.नं. 8717918364

Thursday, 14 January 2016

तेरी बेरूखी

कसम से तेरी ये बेरुखी, मैं न सह पऊंगा ! 
होके जुदा तुझसे , कैसे अब रह पाऊंगा !!
तेरी बेरुखी ईक दिन , मेरी जान लेके जायेगी !
वहां भी मुझे तु ही, बस तु ही याद आयेगी !!
काफ़िलें बड़ते गये, राह बदलते गये !
पर तेरी वफ़ा की बातें , ज़हन से मिट न पाये !!
जोग धारण कर लिया , जोगी तेरे प्यार में !
दर - दर भडकता रहा , तेरे इक दिद़ार में  !!
गज़लें गाता रहा , तेरी जफ़ा की !
हर शब्द में थी , बातें वफ़ा की !!
उल्झा गई मुझे , तेरी ये बेरुखी !
अब कुछ तो बोल , सहा न जाये ये खामोशी !!
बन के बैठा रहा जोगी , तेरी ही द्वार पर !
बे- पलक देखता रहा , उस झूठी आस पर !!
मार गई मुझे बेरुखी , तेरे नैनों की कटार पर !
सांस न भर सका जोगी , एक ही वार पर  !!

                जोगी