लगी थी घूंघट लाज का परदा खोल गये
कुछ न बोले पर आखों से कुछ बोल गये
हमे था यकिं के प्यार है उन्हे हमसे
पर ये भ्रम का जाल भी वो तोड़ गये
बेबसी भी देखो हमारी
वो जा रही थी और हम रोक न पाये...
बरसों बित गई और वो हमे याद रही
होके खफा, खफा यार को मनाना सीखा था
तभी तो उस दिन भी रूठा था
आशियां वही टुट गई
और मंजर वहीं छूट गये...
मुलाकात हुऑ ईक मेले मे उनसे
पुछ लिया कैसे हो हमसे
हमने भी खुश होके ये कह दिया
जुदा होके तुमसे जीना सीख लिया
शायद रास न आई ये बात उन्हे
और लाल आंखों से कुछ कह गये..
अहम था कि वहम था मालूम नही
किस बात पर थी खफा मालूम नही
चाहा जाकर पूछ लूं क्या है माजरा
कदम थे के वहीं के वहीं रूक गये
और हमने भी हस के अलविदा कह दिये....
"जोगी जी"
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