Friday, 29 January 2016

कहिनी:- बबा कहे सियानी के गोठ


           

एक दिन बबा ह तरिया म असनादे ल गईस !  घठऊंदा म समारू ह असनादत रहिस !  असनाद के ओहा  सुरूज देवता ल पानी दे लागिस ! बबा के नजर ह परगे  बबा देख डारि स फेर कहिथे - ऐ का करथस समारू , तरिया के पानी ल तरिया म रिकोत हस ! समारू ह कहिथे - घांसी ते बऊरा गे हस मे तरिया के पानी तरिया म निही सुरूज देवता ल अरपन करत हंवव  !  बबा कहे - अच्छा..... फेर  गुने  लागिस...... , गुन के कहिथे - कस ग समारू त ... सुरूज देवता हर तोर पानी ल झोकिस हे ग अउ झोंकिस हे त कऊनो आसिस नी दिसे ग, काय कहिस हे ग...!
समारू कहे - घांसी निच्चट जोजवा हस ग !
बबा कहे - कईसे ! 
समारू- घांसी ऐ कलजुग हे ग कलजुग म देवता मन नी दिखे फेर झोंक लेथे ओ केहे गेहे न " हुम नई हुम के बास "...!
बबा कहे - बस...  इहीच्च तो मे कहत हंवव ! 
समारू  - कईसे !
बबा - आज तोर ले तो नी झोकिस त तिही सोंच पाछु समे म काखर ले झोके होही ! समारू करम ह बड़े हे ते अपन करम ल कर , तोर करम हर सही रइही त तोला भल आदमी समझ मान गउन दिही अउ गलत करम करबे त बुरा भला कईही फेर तोर मान गउन नी करे , इही मान गउन ह देवता के पुजा ए...!
येदे ते मोर धरम ल भरस्ट कर देहेस ! मोला पाप चढहा देस कहिके फेर डुबकी लगाके गुस्सावत समारू ह रेंग दीस !
बबा - मोर गोठ हर कोनो ले नीक नई लगे बने तो केहे हंव  अरे भई कोनो हर मोला कुछु दीही त मे हर झोंकहूं अउ नी झोकहूं त ओ जिनिस ह गिर जही समारू के पानी ह तरिया म गिरिस त सुरूज देवता हर कहां ले झोकिस  ! अपने अपन म बड़बड़ावत असनादिस गमछा ल झटकार के तन म लपेट के घर आ घलीस ! नहा खोर के तईयार बबा हर चऊरा म बईठे गीत ल गावत हे - 
धरती दाई तोर छाती हे जबर , 
सबो ल समुझे तेहां ऐके बरोबर ...! 
कोन चिरई चिरगुन कोन जंगल झारी
कोन मानुस तन लेहे अवतारी
नई पुछेस तेहां नर अस के नारी
येदे काया के होही उबार संगी रे...
ये चोला के होही उबार संगी रे
मिले हे पारख गियान बने गठिया के धर...!
भोलवा किसान ह खिझियावत आवत रहिस
बबा कहिस - का होगे भोलवा , काखर ऊपर खिझियावत हस !
भोलवा - कुछु नी होय हे घांसी मे हा ओ टुरा ऊपर खिझियावत हंव मोर नाती ऊपर !
बबा कहिस - काय कर दीस तोर नाती हर ! 
भोलवा - ओ टुरा ह.... मोला नईच गमहेरय भई , मोरेच आघु म मोरे म के बीड़ी ल निकार के चोंगियावत रिहिस केहेंव त कहिथे पिबो नही त काय करबो अउ बिजरा के भाग घलीस !
बबा कहे - देख भाई भोलवा हम खेत म धान बोथन त धान जामथे , अब ते हर घर म बमरी के बिरवा लगाबे त बमरीच हर जामही न फेर बमरी के कांटा ह त गढबे कर ही न .... !
भोलवा कथे - घांसी  मे हर अपन दुख ल गावथंव अऊ ते हर रूख राई ल बतावत हस ! 
बबा कहे - बात ओसनहा  नोहे भोलवा ! 
भोलवा - त का हे ! 
बबा कहे - भोलवा तोर घर म बीड़ी लाईस कोन , तेहां त भुगतना ल तो भुगते ल परबेच करही न ! 
वहा दे तहुं हर मोरेच ऐब निकारत हस ! अब मोर आदत परगे त मे का करव जी कहिके रेंग दीस !
बबा फेर अपने म गोठियाय लागिस - हम अपन गलती ल नि सुधार सकेन त दुसर के ल कईसे सुधारबो ! येखर बर हमला दुनिया ह ताना तो मारबे करही ! 
फेर गुनगुनाय लागिस - 
लऊड़ी लेहव ठोंक ठठा के 
अउ ढोर लेहव बने बजा के....
ओसनेहे पानी पिह  रे संगी छान के 
त गुरू बनाहव जान के ....
अतकेच म जसोदा ह घर भितरी ले सियनहा ल बखानत - दिन रात घर भितरी खोखोर खोखोर करत रहिथे , ये मेर ओ मेर थुकत रहिथे हम येकर लिदरी गोबरी करबोन कहत गोबर फेके घुरवा म जावत रहीस ! बबा ल चऊरा म बईठे देख कहिस - राम राम ग बबा ..
बबा - खुस रहा नोनी ..., चुल्हा मेर के ददा ह सुहावत नईहे  अउ फुल ददा ल भितरावत हस ! 
ये काय उटपटांग कहिथस ग बबा जसोदा ह कहिस !
बबा - बने तो केहे हंव ओ ... !   अतके सुघ्घर मिठ्ठ भाखा ते हर अपन घर के सियनहा मेर गोठियाते त तोला आसिष देतिस अउ तेहां बखानत हस , तुहंर खुसी बर का नई करीस सियनहा ह तुंहर फेर तुमन ओखर मान नई रख सकेव ! 
अतका म जसोदा ह बबा बर तंऊआ के चल दीस ! 
बबा हर फेर गुनगुनाय लागिस  -
तोर पिरा ओतकेच जतका मोर पिरा हे
हस गोठिया ले बने जऊन ये जिनगी के किरा हे....
का राखे हे ये तन मा
मया दुलार राख सबो बर मन मा.... !

टीप :- ""कोनो आदमी के सीख हर ओखर समे के आदमीयन बर बुरा लगथे फेर जब उही आदमी हर नई रहय त ओखर सीख ह दुसर आदमी के जिनगी जिये के रद्दा बन जथे ""!

                     सुखन जोगी 
      डोड़की तह -बिल्हा बिलासपुर ( छ.ग.)
                 मो. 8717918364

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