कितना अजिब है
हम दर्शन करने मंदिरों मे जाते हैं
मंदिरों मे अंदर विराजित पत्थर की मूर्ति
आभूषणों से लदी और वस्त्रों से सजी
जहा हम शांति का अनुभव करते हैं
पर हमें कुछ दर्शन नही होता
वहीं मंदिर के बाहर
कुछ अपंग निर्धन निर्वस्त्र गरीब
शायद यही दर्शन है
जो हम वहां नही करना चाहते
उनके अंगों की अपंगता व बरबस जर्जरता
ये सब नहीं देखना चाहते
फिर क्या है ये दर्शन ..?
उसी ईश्वर की बनाई मिट्टी की काया
उसी प्रभु की करूण दया की माया
हम नही देख सकते
पर हम स्वयं के द्वारा बनाये गये ईश्वर
हमारे ही द्वारा सजाये गये प्रभु को
निहार कर अध्यात्म का दर्शन करते हैं
और वहीं जीवन का दर्शन हमें नही होता
जहां जीवन कर्मों व कर्मों के फल पर टीका है
जीवन का हर पल मानो उसी फल पर बीका है
कर्म ही जीवन की अंतिम युक्ति
अंतिम युक्ति से ही मानव की मुक्ति..
जोगी.
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