सत के घूंट पियादे
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सतग्यान के पानी म
तत के जरी घोर
सत के घूंट पियादे |
अर्थ अनर्थ होगे
अनर्थ होगे अर्थ
ऐला सुन सब सोगे
सोये ल जगादे
सत के घूंट पियादे | फंसे हे सब ,निंदा चारी म
धरम लिखत हें , आज उधारी म
काय जाबो कहिथे , दुनियादारी म |
अरे अबूझ अब तो जाग
जिनगी भर सोये रहिबे
थोकिन अपनो बर भाग
अपन लेखा ल ईतिहास म लिखादे
सत के घूंटपियादे||
सब के हवय लिखाये
तोरले तोला कउन देखाये
काबर के ! तोर ल उही मन छुपाये |
जागबे त भागबे
खोजबे त पाबे
कुछु नई करबे
देखत रहि जाबे
मऊका म एक दिन पछताबे |
सनघर्ष हे तोर जीवन
कुरिति ले लडे बर पुरखा करे परन
उही राह म चले बर कर ले अब जतन|
आज करबे के काल करबे
अरे अब नई करबे त कब करबे
सोंचले समझे अउ थोकन परखले
तत के सत ल लइकन के कोथा म गठिया दे
सत के घूंट पियादे |
जिनगी भर करहीं इही बुता ल
करहीं तोरो सुरता ल
नमन करके पुरखा के कर्ताधरता ल |
सबे पारखी बने फिरत हे
लिखत हे अउने पऊने
काखर नाव लेवव मय
दिखही जऊने तऊने धियान लगादे |
सत के घूंट पियादे ||
सुखन जोगी
मो.नं. 8717918364
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